Third Party vs Comprehensive Insurance (कौनसा लें)? — 2026 के नए rules के साथ पूरी जानकारी

पिछले महीने एक reader ने अपनी policy की PDF भेजी और एक ही सवाल पूछा: उसकी Swift एक दीवार से टकराकर ₹68,000 का काम निकाल गई थी, insurance चालू था, फिर claim क्यों reject हुआ? Policy खोलकर पहले पन्ने पर ही जवाब मिल गया। ऊपर लिखा था "Liability Only Policy" — मतलब third party insurance। उस काग़ज़ में उसकी अपनी गाड़ी के लिए एक रुपये का cover था ही नहीं।
Agent ने उसे बेचते वक़्त सिर्फ़ इतना कहा था कि "गाड़ी का insurance हो गया"। ये बात झूठ नहीं थी। बस अधूरी थी — और insurance में अधूरी बात की क़ीमत claim वाले दिन चुकानी पड़ती है। तो यही फ़र्क़ आज पूरा खोलती हूँ, क्योंकि यही एक फ़र्क़ है जिस पर car aur two-wheeler insurance का सारा हिसाब टिका है।
Pakka Points
- Third party insurance = सिर्फ़ दूसरों का नुक़सान। आपकी अपनी गाड़ी का शून्य cover — क़ानूनन ज़रूरी, पर काफ़ी नहीं
- Comprehensive = third party + Own Damage (accident, चोरी, आग, बाढ़) + ₹15 लाख का owner-driver PA cover
- Third party का premium सरकार तय करती है, comprehensive का insurer — इसलिए TP का rate हर कंपनी में एक जैसा है
- 5 August 2026 के Supreme Court order के बाद नई कार पर 4 साल और नए two-wheeler पर 6 साल का TP cover लेना होगा
- IDV वो number है जो चोरी/total loss में आपको मिलने वाली रक़म तय करता है — कम IDV डालकर premium बचाना सबसे महँगी बचत है
Third party insurance क्या है — और क़ानून असल में क्या माँगता है
Motor Vehicles Act, 1988 की Section 146 कहती है कि कोई भी गाड़ी public place पर तब तक नहीं चल सकती जब तक उस पर third party liability का valid insurance न हो। ध्यान दीजिए — क़ानून ने comprehensive नहीं माँगा। उसने सिर्फ़ इतना माँगा कि अगर आपकी गाड़ी से किसी तीसरे को नुक़सान हो, तो उस अनजान इंसान को मुआवज़ा मिलने की गारंटी रहे। क़ानून की चिंता आपकी गाड़ी नहीं है, सड़क पर चलने वाला वो तीसरा आदमी है।
यही वजह है कि इसका दूसरा नाम Liability Only Policy है — आपकी policy के पहले पन्ने पर अगर यही शब्द लिखे हैं, तो आपके पास comprehensive नहीं है, चाहे agent ने कुछ भी कहा हो।
Third party में क्या मिलता है — और वो limit जो कोई नहीं बताता
यहाँ एक बहुत बड़ी fine print है जो मुझे लगभग हर दूसरे reader को समझानी पड़ती है। Third party cover दो हिस्सों में बँटा होता है, और दोनों की limit बिल्कुल अलग है:
| किस चीज़ का नुक़सान | कितना cover | कौन तय करता है |
|---|---|---|
| तीसरे इंसान की मौत या चोट | कोई ऊपरी limit नहीं — unlimited | Motor Accident Claims Tribunal (MACT) |
| तीसरे की property (गाड़ी, दीवार, दुकान) | ज़्यादा से ज़्यादा ₹7.5 लाख | Policy की standard limit |
| आपकी अपनी गाड़ी | ₹0 — कुछ नहीं | — |
| आपकी अपनी चोट (owner-driver) | ₹15 लाख (compulsory PA cover) | IRDAI-mandated |
Injury/death पर unlimited liability का मतलब है कि Tribunal जो भी रक़म तय करे, insurer भरेगा — यही third party policy की सबसे बड़ी असली value है, और यही वजह है कि इसे क़ानूनी रूप से अनिवार्य रखा गया है।
उस ₹15 लाख वाले PA cover पर एक footnote: उसका premium अलग से क़रीब ₹750 सालाना होता है और वो third party तथा comprehensive — दोनों तरह की policy के साथ लगता है। अगर आपके नाम पर पहले से किसी और गाड़ी की policy में ये cover चालू है, तो आप इसे दूसरी गाड़ी में हटवा सकते हैं (IRDAI ने ये छूट दे रखी है)। एक ही इंसान से दो बार ₹750 वसूला जाए, ये ज़रूरी नहीं — पर बताया तब तक नहीं जाता जब तक आप ख़ुद न पूछें।
Comprehensive insurance क्या होता है
Comprehensive कोई अलग product नहीं है — ये वही third party policy है जिसके ऊपर Own Damage (OD) section जोड़ दिया गया है। Policy document में आपको दो अलग premium दिखेंगे, और आपका पूरा फ़ैसला असल में उसी दूसरे number पर टिका है।
OD section में ये चीज़ें आती हैं:
- Accident damage — टक्कर, पलटना, गड्ढे से हुआ नुक़सान
- चोरी — पूरी गाड़ी चोरी हो जाए तो IDV के बराबर रक़म
- आग, विस्फोट, self-ignition — शॉर्ट सर्किट वाला case भी इसी में आता है
- Natural calamity — बाढ़, भूकंप, तूफ़ान, भूस्खलन (2023 के बाद के हर मानसून में सबसे ज़्यादा claim यहीं से आए हैं)
- Man-made — दंगा, हड़ताल, तोड़फोड़, आतंकी घटना
- Transit damage — road, rail, air या lift से गाड़ी ले जाते वक़्त हुआ नुक़सान
दोनों का सीधा फ़र्क़ — एक ही table में
| Third Party (Liability Only) | Comprehensive | |
|---|---|---|
| क़ानूनन ज़रूरी? | हाँ — Section 146 के तहत | नहीं, अपनी मर्ज़ी से |
| दूसरों का नुक़सान | पूरा cover | पूरा cover |
| आपकी गाड़ी का नुक़सान | बिल्कुल नहीं | हाँ — IDV की limit तक |
| चोरी | नहीं | हाँ |
| बाढ़ / आग | नहीं | हाँ |
| Premium कौन तय करता है | सरकार (MoRTH + IRDAI) | Insurance company ख़ुद |
| हर कंपनी में rate | एक जैसा | अलग-अलग — यहीं compare करने का फ़ायदा है |
| No Claim Bonus | नहीं मिलता | मिलता है — 20% से 50% तक |
| Add-ons (zero-dep वग़ैरह) | नहीं ले सकते | ले सकते हैं |
Premium का असली फ़र्क़ कितना है
Third party का rate insurer तय नहीं करता — Ministry of Road Transport & Highways IRDAI के साथ मिलकर notify करता है, और वो हर कंपनी पर एक जैसा लागू होता है। मौजूदा rates 1 June 2022 की notification से चले आ रहे हैं और अगस्त 2026 तक वही चल रहे हैं (हर साल की तरह इस साल भी 10-25% बढ़ोतरी का प्रस्ताव चर्चा में है, पर अभी gazette नहीं हुआ — जिस दिन होगा, ये page update होगा):
| गाड़ी | Engine capacity | सालाना TP premium |
|---|---|---|
| Private car | 1000 cc तक | ₹2,094 |
| Private car | 1000-1500 cc | ₹3,416 |
| Private car | 1500 cc से ऊपर | ₹7,897 |
| Two-wheeler | 75 cc तक | ₹538 |
| Two-wheeler | 75-150 cc | ₹714 |
| Two-wheeler | 150-350 cc | ₹1,366 |
| Two-wheeler | 350 cc से ऊपर | ₹2,804 |
इन सब पर 18% GST अलग से लगता है। Private electric vehicle पर TP premium में 15% और hybrid पर 7.5% की छूट मिलती है — EV वालों को ये अक्सर अपने आप नहीं मिलती, quote में check कीजिए।
अब असली तुलना। एक 1.2-litre hatchback पर third party premium क़रीब ₹3,416 (+GST) बैठता है। उसी गाड़ी की comprehensive policy — मान लीजिए IDV ₹5 लाख — क़रीब ₹11,000 से ₹16,000 के बीच आती है, कंपनी और add-ons के हिसाब से। यानी सालाना फ़र्क़ लगभग ₹8,000-12,000 का है, महीने के हिसाब से ₹700-1,000। उधर उसी गाड़ी का एक ठीक-ठाक bumper-plus-bonnet का काम ही ₹40,000 पार कर जाता है। ये गणित हर किसी के लिए एक जैसा नहीं बैठता — पर ज़्यादातर लोगों के लिए बैठ जाता है।
5 August 2026 का Supreme Court order — नई गाड़ी का नियम बदल गया
ये वो हिस्सा है जो अभी internet पर मौजूद ज़्यादातर articles में नहीं मिलेगा, इसलिए ध्यान से पढ़िए। 5 अगस्त 2026 को Justice Sanjay Karol और Justice Prashant Kumar Mishra की bench ने एक motor accident मुआवज़े के मामले में कई अहम निर्देश दिए। Court के सामने आँकड़ा ये रखा गया कि देश की 30.48 करोड़ registered गाड़ियों में से 16.54 करोड़ — यानी क़रीब 56% — बिना valid insurance के सड़क पर चल रही हैं।
Court ने जो कहा, उसका सीधा असर आपकी अगली गाड़ी की ख़रीद पर पड़ेगा:
| नई गाड़ी पर अनिवार्य TP cover | पहले | 5 Aug 2026 के order के बाद |
|---|---|---|
| नई car | 3 साल | 4 साल |
| नया two-wheeler | 5 साल | 6 साल |
ये cover showroom पर गाड़ी के साथ ही बिकता है, इसलिए on-road price थोड़ी बढ़ेगी। Order MoRTH और IRDAI के ज़रिए लागू होगा — जब तक आपके शहर के dealer को circular नहीं पहुँचता, invoice पर पुराना 3/5 साल वाला ही दिख सकता है। Delivery से पहले policy की term ख़ुद पढ़ लीजिए।
इसी order में Court ने दो और चीज़ें कहीं — बिना insurance वाली गाड़ियों पर automatic e-challan, और एक pilot project जिसमें ANPR कैमरों से पहचानकर बिना insurance वाली गाड़ी को petrol पंप पर fuel देने से मना किया जाए। ये pilot अभी प्रस्ताव है, लागू नहीं — पर दिशा साफ़ है। जो लोग "insurance लैप्स हो गया, बाद में करा लेंगे" वाली आदत पर चलते हैं, उनके लिए वो खिड़की बंद हो रही है।
Standalone Own Damage — तीसरा option, जो agent नहीं बताता
IRDAI ने 2019 से एक तीसरा रास्ता खोल रखा है जिसका ज़िक्र मुश्किल से होता है: Standalone Own Damage policy। इसमें आप third party cover एक कंपनी से लेते हैं और अपनी गाड़ी का OD cover किसी दूसरी कंपनी से — दोनों को एक ही जगह से लेना ज़रूरी नहीं।
ये किसके काम की चीज़ है? ख़ास तौर पर उनके, जिनकी नई गाड़ी पर showroom से 4 साल का TP बँधा हुआ है। उस case में आपका TP तो अगले चार साल चलेगा ही — आपको हर साल सिर्फ़ OD खरीदना है, और वो आप उस कंपनी से ले सकते हैं जो उस साल सबसे अच्छा claim settlement और rate दे रही हो। मैंने पिछले साल एक reader का हिसाब देखा था: dealer के bundled OD renewal के मुक़ाबले standalone OD अलग से लेने पर उसका सालाना premium ₹4,200 कम हो गया, cover बिल्कुल वही रहा।
Agent ये option नहीं बताएगा, main बता रही हूँ — क्योंकि इसमें उसका commission दो टुकड़ों में बँट जाता है।
IDV — वो number जिस पर पूरा claim टिका है
Insured Declared Value यानी आपकी गाड़ी की वो value जो insurer ने मानी है। चोरी हो जाए या गाड़ी total loss घोषित हो जाए, तो आपको मिलेगा — IDV, न कि गाड़ी की ख़रीद क़ीमत, न बाज़ार भाव। Formula सीधा है:
| Formula | |
|---|---|
| IDV | गाड़ी की ex-showroom क़ीमत − उम्र के हिसाब से depreciation |
Registration cost, road tax और insurance की रक़म IDV में नहीं जुड़ती। Accessories अलग से declare करने पर ही cover होती हैं।
| गाड़ी की उम्र | Depreciation | IDV लगभग |
|---|---|---|
| 6 महीने तक | 5% | ex-showroom का 95% |
| 6 महीने - 1 साल | 15% | 85% |
| 1-2 साल | 20% | 80% |
| 2-3 साल | 30% | 70% |
| 3-4 साल | 40% | 60% |
| 4-5 साल | 50% | 50% |
5 साल से पुरानी गाड़ी की IDV insurer और आपके बीच आपसी सहमति से तय होती है — यहीं मोल-भाव की गुंजाइश बनती है, और यहीं सबसे ज़्यादा लोग फँसते हैं।
अब वो trap जो हर online quote page पर बना हुआ है। Quote की screen पर IDV का एक slider होता है — उसे नीचे खिसकाते ही premium गिरता दिखता है, और लोग ख़ुश होकर ₹1,200 बचा लेते हैं। पर वही slider ये तय कर रहा है कि गाड़ी चोरी होने पर आपको ₹4.8 लाख मिलेंगे या ₹3.6 लाख। ₹1,200 बचाने के लिए ₹1.2 लाख का जोखिम लेना कोई बचत नहीं है। IDV हमेशा गाड़ी की असली बाज़ार क़ीमत के जितना पास हो सके, उतना रखिए।
No Claim Bonus — ये आपका है, गाड़ी का नहीं
हर claim-free साल पर अगले renewal में OD premium पर discount मिलता है। ये तभी मिलता है जब आपके पास comprehensive या standalone OD policy हो — third party पर NCB का कोई concept नहीं है।
| लगातार claim-free साल | NCB discount (OD premium पर) |
|---|---|
| 1 साल | 20% |
| 2 साल | 25% |
| 3 साल | 35% |
| 4 साल | 45% |
| 5 साल या ज़्यादा | 50% |
NCB सिर्फ़ OD premium पर लगता है, third party हिस्से या add-on premium पर नहीं — इसलिए 50% NCB का मतलब कुल premium आधा हो जाना नहीं है।
दो बातें जो ज़्यादातर लोगों को नहीं पता। पहली: NCB गाड़ी के साथ नहीं, आपके नाम के साथ चलता है — पुरानी गाड़ी बेचकर नई लेंगे तो NCB Retention Letter लेकर अपना 50% नई गाड़ी पर shift करा सकते हैं। दूसरी: policy लैप्स होने के 90 दिन के अंदर renew न किया तो पूरा NCB शून्य हो जाता है। पाँच साल की बचाई हुई 50% छूट एक तारीख़ चूकने पर चली जाती है।
इसीलिए ₹8,000 का एक छोटा dent claim करने से पहले एक बार हिसाब लगा लीजिए — उससे अगले साल आपका NCB 50% से गिरकर 20% पर आ जाएगा, और वो नुक़सान अक्सर claim की रक़म से बड़ा होता है।
Add-ons — कौनसा, किस शर्त पर
Add-ons सिर्फ़ comprehensive या standalone OD के साथ मिलते हैं। मैं इनमें से किसी को "must have" नहीं कहती — हर एक की एक शर्त है:
| Add-on | क्या करता है | किसके लिए सही है |
|---|---|---|
| Zero Depreciation | Parts पर depreciation कटौती हटा देता है — पूरा claim मिलता है | 5 साल से नई गाड़ी, plastic parts ज़्यादा, city driving |
| Engine Protect | पानी भरने या oil leak से engine seize होने पर cover | बाढ़/जलभराव वाले शहर (मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु, गुरुग्राम) |
| Roadside Assistance | Towing, on-spot repair, fuel delivery | लंबे highway trips; शहर में ही रहते हैं तो skip |
| Return to Invoice | चोरी/total loss में IDV नहीं, पूरी invoice क़ीमत मिलती है | 3 साल से नई गाड़ी, loan चालू हो तो और ज़रूरी |
| Consumables | Oil, nut-bolt, coolant जैसी चीज़ों का ख़र्च | Claim अक्सर होते हों तभी — वरना premium वसूल नहीं होता |
| NCB Protect | एक claim के बाद भी NCB बचा रहता है | पुराना NCB 45-50% हो, तभी गणित बैठता है |
तो कौनसा लें — मेरा verdict, शर्तों के साथ
"Comprehensive हमेशा बेहतर है" वाली सलाह मैं नहीं दूँगी, क्योंकि वो हर गाड़ी पर सच नहीं है। असली सवाल एक ही है: गाड़ी कल टूट जाए तो उसे ठीक कराने के पैसे आपके पास अपनी जेब से हैं या नहीं?
- नई गाड़ी, loan चालू है — comprehensive, zero-dep के साथ। यहाँ कोई शर्त नहीं; bank भी यही माँगेगा और गाड़ी टूटने पर EMI तो चलती ही रहेगी।
- गाड़ी 5 साल से नई, रोज़ चलती है — comprehensive। OD premium अभी भी IDV का 3-4% के आस-पास होगा, और एक accident उससे कहीं महँगा पड़ेगा।
- गाड़ी 8-12 साल पुरानी, IDV ₹80,000-1.5 लाख — यहाँ हिसाब लगाइए। अगर OD premium IDV का 10% पार कर रहा है और टूटने पर आप उसे बेच ही देंगे, तो third party + engine protect काफ़ी है। पर अगर वही गाड़ी आपकी रोज़ की ज़रूरत है, तो comprehensive रखिए, IDV कम होने के बावजूद।
- Two-wheeler, रोज़ का office commute — comprehensive, क्योंकि दोपहिया चोरी की दर सबसे ज़्यादा है और ₹714 का TP उसमें कुछ नहीं देता।
- गाड़ी घर में खड़ी रहती है, साल में 2,000 km — third party + PA cover। यही अकेली situation है जहाँ मैं comprehensive छोड़ने की बात कहती हूँ।
एक बात दोनों में common है और वो सबसे ज़रूरी है — policy चालू रखिए। 56% गाड़ियाँ बिना insurance के चल रही हैं, और उनमें से हर एक के मालिक के लिए एक accident पूरी ज़िंदगी की बचत ख़त्म कर देने वाला event है, क्योंकि MACT का मुआवज़ा उनकी अपनी जेब से जाएगा।
Claim के वक़्त पैसा रोकने वाली 5 clauses
ये वो हिस्सा है जहाँ comprehensive होने के बावजूद लोग ख़ाली हाथ रह जाते हैं। पाँचों असली policy wordings से हैं:
- Valid driving licence — accident के वक़्त चलाने वाले के पास उस category का वैध licence न हो, तो OD claim reject। Learner licence पर बिना qualified driver के गाड़ी चलाना भी इसी में आता है।
- शराब — "driving under the influence of intoxicating liquor or drugs" हर policy का standard exclusion है। यहाँ third party हिस्से में insurer पहले victim को भुगतान करता है, फिर वही रक़म आपसे वसूलता है (recovery right)।
- Commercial use — private registration वाली गाड़ी को किराए पर या app-based taxi की तरह चलाना policy की शर्त तोड़ता है। Claim उसी दिन खड़ा हो जाता है।
- देरी से सूचना — ज़्यादातर policies accident की सूचना "immediately and in any case within 48 hours" माँगती हैं। चोरी में FIR भी तुरंत ज़रूरी है। एक हफ़्ते बाद फ़ोन करना अपने-आप में claim कमज़ोर कर देता है।
- बिना मंज़ूरी repair — surveyor के देखने से पहले गाड़ी खुलवा लेना या garage को काम शुरू करा देना। Surveyor जो नहीं देख पाया, वो assess भी नहीं करेगा।
इन पाँचों में एक pattern है: चारों गड़बड़ियाँ accident वाले दिन होती हैं, policy ख़रीदते वक़्त नहीं। इसलिए policy की exclusions की list एक बार आराम से पढ़ लेना — 15 मिनट का काम है, और ठीक उसी 15 मिनट को हर agent "बाद में पढ़ लेना" कहकर टालता है।
Health और term insurance की fine print भी इसी तरह काम करती है — अगर इस तरह clause पढ़ना काम का लगा, तो health insurance में क्या cover होता है और term insurance क्या है वाले guides भी उसी तरह लिखे हैं। गाड़ी loan पर ली है तो CIBIL score वाला हिस्सा भी काम आएगा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Third party insurance kya hai aur ye kya cover karta hai?
Third party insurance वो minimum cover है जो Motor Vehicles Act, 1988 की Section 146 के तहत हर गाड़ी पर क़ानूनन ज़रूरी है। ये सिर्फ़ उस तीसरे इंसान का नुक़सान भरता है जिसे आपकी गाड़ी से चोट लगी या जिसकी property टूटी — उसकी मौत या injury पर मुआवज़ा (कोई ऊपरी limit नहीं, Tribunal तय करता है) और उसकी गाड़ी/दीवार/दुकान के नुक़सान पर ज़्यादा से ज़्यादा ₹7.5 लाख। आपकी अपनी गाड़ी का एक रुपया भी इसमें नहीं मिलता।
Comprehensive insurance me kya kya cover hota hai?
Comprehensive में दो हिस्से होते हैं — वही third party liability, और उसके ऊपर Own Damage (OD)। OD में आपकी अपनी गाड़ी का accident damage, चोरी, आग, बाढ़/भूकंप जैसी natural calamity, और दंगे-तोड़फोड़ जैसे man-made नुक़सान शामिल हैं। साथ में owner-driver का ₹15 लाख का compulsory personal accident cover भी जुड़ा होता है।
Third party insurance me apni gaadi ka nuksan cover hota hai kya?
नहीं। ये सबसे बड़ी और सबसे महँगी ग़लतफ़हमी है। Third party policy का पूरा मक़सद ही दूसरे को हुए नुक़सान की भरपाई है — आपकी गाड़ी अगर टकराकर पूरी तरह टूट जाए, जल जाए या चोरी हो जाए, तो third party policy से शून्य मिलेगा। अपनी गाड़ी के लिए या तो comprehensive चाहिए या standalone Own Damage policy।
Purani gaadi ke liye third party lena chahiye ya comprehensive?
इसका जवाब गाड़ी की उम्र से नहीं, उसकी IDV से निकलता है। अगर IDV इतनी गिर चुकी है कि OD premium उसका 8-10% से ज़्यादा हो रहा है और गाड़ी टूटने पर आप उसे repair कराने के बजाय बेच ही देंगे — तब third party काफ़ी है। लेकिन अगर गाड़ी 12 साल पुरानी होकर भी आपकी रोज़ की ज़रूरत है और उसे बदलने के पैसे अभी नहीं हैं, तो IDV कम होने के बावजूद comprehensive ही सही है।
Insurance ke bina gaadi chalane par kitna jurmana lagta hai?
Motor Vehicles Act की Section 196 के तहत पहली बार पकड़े जाने पर ₹2,000 जुर्माना या 3 महीने तक की क़ैद या दोनों; दोबारा पकड़े जाने पर ₹4,000 या 3 महीने तक की क़ैद या दोनों। इससे बड़ा ख़तरा ये है कि बिना insurance वाली गाड़ी से accident होने पर Tribunal का पूरा मुआवज़ा आपकी अपनी जेब से जाता है — और वो लाखों-करोड़ों में हो सकता है।
Third party se comprehensive me switch kar sakte hain kya?
हाँ, renewal के वक़्त बदल सकते हैं। पर एक practical बात: अगर गाड़ी लंबे समय से सिर्फ़ third party पर चल रही थी, तो comprehensive देने से पहले insurer गाड़ी का pre-inspection कराएगा (अक्सर app पर video से) और पहले से मौजूद डेंट/स्क्रैच को policy में excluded मार्क कर देगा। यानी switch करने के बाद पुराने नुक़सान का claim नहीं मिलेगा — सिर्फ़ आगे के लिए cover चालू होगा।
Zero depreciation cover lena chahiye ya nahi?
मेरा जवाब शर्त के साथ है। अगर गाड़ी 5 साल से नई है, उसमें plastic/fibre parts ज़्यादा हैं (आजकल की लगभग हर hatchback), या आप metro traffic में रोज़ चलाते हैं — तब हाँ, zero-dep का premium वसूल हो जाता है, क्योंकि बिना उसके plastic parts पर 50% तक depreciation कट जाता है। अगर गाड़ी 7 साल से पुरानी है (ज़्यादातर insurers तब देते भी नहीं) या साल में मुश्किल से 4,000 km चलती है, तो छोड़ दीजिए।
Pakke Sources — हमने कहाँ से verify किया
- Motor Vehicles Act, 1988 — Section 146 & Section 196 — TP insurance anivarya; bina insurance chalane par ₹2,000 (pehli baar) / ₹4,000 (dobara) ya 3 mahine tak ki qaid
- PIB — Plying motor vehicles without valid third party insurance is a punishable offence — Section 196 ke tahat saza ki official press release
- MoRTH — Motor Third Party Premium notification (1 June 2022) — Private car ₹2,094 / ₹3,416 / ₹7,897; two-wheeler ₹538 / ₹714 / ₹1,366 / ₹2,804 — Aug 2026 tak yahi lagu
- IRDAI — motor insurance regulations & standalone Own Damage policy — 2019 se standalone OD ki chhoot; owner-driver CPA cover ₹15 lakh (~₹750 premium)
- Business Today — Supreme Court extends mandatory motor insurance cover for new vehicles (5 Aug 2026) — Nayi car 4 saal, naya two-wheeler 6 saal; 30.48 crore registered gaadiyon me se 16.54 crore bina valid insurance